सीमाओं के पार भारतीयता का संवाद
मोहन भागवत का वैश्विक प्रवास और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘ की समकालीन प्रासंगिक
डॉ. एकता जैन
स्वतंत्र लेखिका
आज तकनीक ने संसार की भौगोलिक दूरियाँ लगभग समाप्त कर दी हैं, किंतु क्या मनुष्य वास्तव में एक–दूसरे के निकट आया है? संचार के साधन बढ़े हैं, पर धार्मिक पहचान, सांस्कृतिक अस्मिता, प्रवासन और राजनीतिक ध्रुवीकरण ने मनुष्यों के बीच नई दूरियाँ भी पैदा की हैं। ऐसे समय में भारतीय सभ्यतागत दृष्टि का ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘ सूत्र एक बार फिर प्रासंगिक प्रश्न उपस्थित करता है – क्या विविधताओं को सुरक्षित रखते हुए एकता संभव है?
इसी प्रश्न की पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन का प्रवास विशेष रूप से विचारणीय हो जाता है।
एक यात्रा, जो केवल यात्रा नहीं थी
मोहन भागवत का यह विदेश प्रवास संघ के शताब्दी वर्ष से जुड़े वैश्विक संपर्क अभियान के संदर्भ में हुआ। अमेरिका से कनाडा और फिर ब्रिटेन तक पहुँची इस यात्रा में प्रवासी भारतीयों से संवाद, भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि की प्रस्तुति तथा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के विचार को व्यापक समाज तक पहुँचाने का प्रयास दिखाई देता है।
किन्तु किसी यात्रा का अर्थ केवल उसके आयोजकों द्वारा निर्धारित नहीं होता। किसी यात्रा का वास्तविक अर्थ उन विचारों और प्रश्नों से भी निर्मित होता है, जिन्हें वह अपने पीछे छोड़ जाती है।
मोहन भागवत के इस प्रवास के साथ भी यही हुआ ।
एक ओर उनके कार्यक्रमों में भारतीय संस्कृति, सामाजिक समरसता, एकात्मता और मानव–बंधुत्व की चर्चा हुई; दूसरी ओर संघ की वैचारिक भूमिका को लेकर कुछ स्थानों पर आलोचनात्मक स्वर भी सुनाई दिए । यही कारण है कि इस यात्रा को केवल प्रशंसा अथवा केवल आलोचना के चश्मे से देखना उचित नहीं होगा।
किसी भी गंभीर विमर्श के लिए संवाद और असहमति – दोनों को साथ लेकर चलना आवश्यक
है। भारतीयता : एकरूपता नहीं, समन्वय
मोहन भागवत के 2026 के अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन प्रवास के दौरान एक विचार विशेष रूप से उभरकर सामने आया–एकता के लिए एकरूपता आवश्यक नहीं है। यह बात पहली दृष्टि में सरल लग सकती है, किंतु इसके भीतर भारतीय सामाजिक अनुभव की एक गहरी व्याख्या छिपी है।
भारत का इतिहास केवल एक भाषा, एक पंथ या एक जीवन–पद्धति का इतिहास नहीं है। यहाँ अनेक भाषाएँ विकसित हुईं, अनेक दर्शन जन्मे, विविध उपासना–पद्धतियाँ विकसित हुईं और विभिन्न सांस्कृतिक परंपराओं ने एक–दूसरे के साथ रहते हुए अपनी–अपनी विशिष्टता बनाए रखी। भारतीय सभ्यतागत अनुभव की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह रही है कि उसने अनेक भिन्न परंपराओं के सह–अस्तित्व और उनके बीच संवाद की संभावनाओं को स्थान दिया। इसीलिए भारतीयता को यदि केवल राजनीतिक या भौगोलिक पहचान के रूप में न देखकर समन्वय की संस्कृति के रूप में देखा जाए, तो उसके भीतर आज के विश्व के लिए भी एक महत्त्वपूर्ण संदेश दिखाई देता है।
एकरूपता कहती है–भिन्नता कम करो, तभी एकता आएगी।
समन्वय कहता है – भिन्न रहो, किंतु संबंध बनाए रखो। आज के विश्व को शायद इसी दूसरे मार्ग की आवश्यकता है।
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’: एक प्राचीन सूत्र, एक आधुनिक प्रश्न
‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘ आज भारत की वैश्विक पहचान से जुड़े सबसे अधिक उद्धृत सूत्रों में से एक है। किंतु इस वाक्य की वास्तविक शक्ति केवल इसके सुंदर उच्चारण में नहीं, बल्कि इसके भीतर निहित जीवन–दृष्टि में है। महाउपनिषद् का प्रसिद्ध वचन है-
“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥” (अध्याय 4, श्लोक 71)
अर्थात् ‘यह अपना है और वह पराया’ – इस प्रकार का विभाजन संकीर्ण दृष्टि का परिचायक है; उदार चरित्र वाले मनुष्यों के लिए पूरी पृथ्वी परिवार के समान है। यहाँ ‘परिवार‘ शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है। परिवार केवल प्रेम का संबंध नहीं होता; वह उत्तरदायित्व का संबंध भी होता है। यदि संसार वास्तव में परिवार है, तो दूसरे समाज की पीड़ा के प्रति उदासीन रहना इस विचार की आत्मा के अनुरूप नहीं हो सकता। यदि दूसरे की संस्कृति का सम्मान करना है, तो उसके अस्तित्व को केवल सहना नहीं, उसे समझना भी होगा।
यहीं ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘ एक प्राचीन श्लोक से आगे बढ़कर आधुनिक विश्व के सामने एक गंभीर प्रश्न बन जाता है-
क्या हम दूसरे को इसलिए स्वीकार करेंगे कि वह हमारे जैसा है, अथवा इसलिए कि वह भिन्न होते हुए भी मनुष्य है? भारतीय सभ्यतागत दृष्टि की वास्तविक परीक्षा इसी प्रश्न पर होगी ।
प्रवासी भारतीय: स्मृति और वर्तमान के बीच सेतु
मोहन भागवत की विदेश यात्रा को प्रवासी भारतीय समाज के संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जा सकता। अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में रहने वाला भारतीय मूल का समाज अपनी भाषा, परिवार, त्योहारों, खान–पान और सांस्कृतिक परंपराओं के माध्यम से अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है। किंतु प्रवासी भारतीय की पहचान केवल अतीत से संबंध बनाए रखने की पहचान नहीं है। वह जिस देश में रहता है, वहाँ उसके नागरिक दायित्व भी हैं। इसलिए आज प्रवासी भारतीयता के सामने प्रश्न केवल यह नहीं है कि-
“हम अपनी जड़ों को कैसे बचाएँ?”
बल्कि यह भी है—
“अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए हम अपनी कर्मभूमि के प्रति पूर्ण निष्ठा कैसे निभाएँ?”
“क्या सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए बहुलतावादी समाज में साझा नागरिकता का दायित्व निभाया जा सकता है?”
यहीं प्रवासी भारतीय समुदाय दो संस्कृतियों के बीच पुल की भूमिका निभा सकता है।
अपनी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए जिस समाज में वह रहता है, उसके प्रति उत्तरदायी रहना किसी विरोधाभास का नहीं, बल्कि परिपक्व सांस्कृतिक चेतना का संकेत हो सकता है।
स्वदेशी: केवल वस्तु नहीं, आत्मबोध
यहाँ एक और विचार स्वाभाविक रूप से सामने आता है – स्वदेशी ।
इसी संदर्भ में स्वदेशी की अवधारणा को भी समझना आवश्यक है। स्वदेशी केवल विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का नाम नहीं, बल्कि अपने श्रम, ज्ञान, संसाधनों और उत्पादन क्षमता पर विश्वास का भाव है। यह आत्मनिर्भरता का ऐसा रूप हो सकता है जो विश्व से विमुख नहीं, बल्कि विश्व के साथ आत्मविश्वासपूर्ण संवाद की क्षमता प्रदान करता है। सच्चा स्वदेशी संसार से विमुख नहीं करता; वह अपनी जड़ों में दृढ़ होकर संसार से संवाद करने का आत्मविश्वास देता है। भारतीयता उसका सांस्कृतिक आधार हो सकती है और स्वदेशी उसका आर्थिक एवं व्यवहारिक विस्तार |
जहाँ स्वागत है, वहाँ प्रश्न भी हैं
मोहन भागवत के प्रवास के दौरान जहाँ अनेक स्थानों पर स्वागत और समर्थन देखने को मिला, वहीं कुछ संगठनों और समूहों ने संघ की विचारधारा तथा उसकी सामाजिक भूमिका को लेकर प्रश्न भी उठाए । अमेरिका में धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े एक अमेरिकी आयोग ने संघ के संबंध में प्रतिबंधात्मक कदमों की अनुशंसा की, जिसे भारत और संघ ने अस्वीकार किया। ब्रिटेन में भी उनकी यात्रा को लेकर विभिन्न प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। लंदन में एक गुरुद्वारे की उनकी यात्रा ने विशेष चर्चा उत्पन्न की और समुदाय के भीतर अलग–अलग मत सामने आए।
इन घटनाओं को केवल विवाद के रूप में देखना शायद पर्याप्त नहीं होगा ।
इनसे एक अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न निकलता है-
क्या संवाद का अर्थ केवल सहमति है?
यदि दो पक्ष पहले से ही एक–दूसरे से सहमत हैं, तो संवाद सरल होता है। वास्तविक संवाद वहाँ आरंभ होता है जहाँ मतभेद होते हुए भी एक–दूसरे को सुनने की इच्छा बनी रहती है। इस अर्थ में असहमति संवाद का अंत नहीं है। कभी–कभी वही संवाद की वास्तविक शुरुआत होती है।
इस यात्रा का वास्तविक अर्थ क्या है?
मोहन भागवत के इस प्रवास को कई स्तरों पर देखा जा सकता है।
यह संघ के शताब्दी वर्ष का वैश्विक संपर्क अभियान है।
यह प्रवासी भारतीय समाज से सांस्कृतिक संवाद का माध्यम है।
यह भारतीय सभ्यतागत विचार को वैश्विक मंच पर रखने का प्रयास है।
और इससे भी आगे बढ़कर यह स्वयं भारत के लिए आत्मपरीक्षण का अवसर है।
क्योंकि यदि हम विश्व को परिवार मानने की बात करते हैं, तो सबसे पहले हमें अपने भीतर यह क्षमता विकसित करनी होगी कि हम भिन्न विचार रखने वाले व्यक्ति को भी अपने सामाजिक परिवार का हिस्सा मान सकें । ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘ की विश्वसनीयता विश्व को समझाने से नहीं, उसे अपने आचरण में उतारने से सिद्ध होगी।
निष्कर्ष : यात्रा समाप्त होती है, संवाद नहीं
अंततः किसी यात्रा का मूल्य केवल इस बात से निर्धारित नहीं होता कि वह कितने देशों तक पहुँची, बल्कि इससे कि उसने कितने संवादों को जन्म दिया। मोहन भागवत का यह प्रवास भी इसी कसौटी पर देखा जाना चाहिए। यदि भारतीयता विविधताओं के बीच समन्वय की चेतना है, तो उसका वैश्विक संदेश तभी विश्वसनीय होगा, जब वह असहमति के लिए भी स्थान बनाए । और यदि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘ का अर्थ पृथ्वी को परिवार मानना है, तो उसका पहला दायित्व दूसरे को बदलना नहीं, उसे समझना है।
यात्राएँ समाप्त होती हैं; संवाद नहीं। शायद इसी सतत संवाद में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की आधुनिक प्रासंगिकता निहित है।
वह हमारे व्यवहार में होना चाहिए ।






